अब छोटे शहरों में भी बड़े पर्दे पर दिखेगी पहाड़ की कहानी, ‘पायर’ लेकर पहुंचेंगे विनोद कापड़ी

-पहाड़ के अकेलेपन और पलायन की मार्मिक दास्तां ‘पायर’, 30 अक्टूबर को हिंदी और मलयालम में होगी रिलीज
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में पलायन, अकेलेपन और अपनों के इंतजार की मार्मिक कहानी को बड़े पर्दे पर उतारने वाली फिल्मकार विनोद कापड़ी की फिल्म ‘पायर (चिता)’ अब प्रदेश के छोटे शहरों तक पहुंचेगी। पारंपरिक सिनेमाघरों से दूर रहने वाले दर्शकों को सिनेमा का अनुभव उपलब्ध कराने के उद्देश्य से फिल्म के विशेष प्रदर्शन 14 से 17 अक्टूबर के बीच बेरीनाग, बागेश्वर और श्रीनगर गढ़वाल में आयोजित किए जाएंगे। इन प्रदर्शनों के लिए पिक्चरटाइम (Picture Time) की मोबाइल थिएटर सुविधा का इस्तेमाल किया जाएगा।
फिल्मकार विनोद कापड़ी की यह पहल उन दर्शकों के लिए खास है, जिनके शहरों में स्थायी सिनेमाघर उपलब्ध नहीं हैं। मोबाइल थिएटर के माध्यम से फिल्म को सीधे स्थानीय दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है, ताकि उन्हें सिनेमा देखने के लिए दूरस्थ शहरों का रुख न करना पड़े।
विनोद कापड़ी का कहना है कि ‘पायर’ पहाड़ और वहां रहने वाले लोगों की कहानी है। उनकी इच्छा थी कि उत्तराखंड के लोग, खासकर छोटे शहरों में रहने वाले दर्शक, इस फिल्म को बड़े पर्दे पर देखने का अनुभव हासिल कर सकें। सिनेमा को भूगोल और सुविधाओं की सीमाओं में नहीं बांधा जाना चाहिए। इसी सोच के साथ फिल्म को दर्शकों तक पहुंचाने की पहल की गई है। उन्हें उम्मीद है कि दर्शक फिल्म में अपने जीवन, परिवार और भावनाओं की झलक महसूस करेंगे।
पलायन की पीड़ा और अपनों के इंतजार की कहानी
उत्तराखंड के पहाड़ों की पृष्ठभूमि पर बनी ‘पायर’ एक बुजुर्ग दंपती की संवेदनशील कहानी है। उनके बच्चे बेहतर अवसरों और भविष्य की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं, जबकि बुजुर्ग दंपती अपने शांत जीवन में उनकी वापसी का इंतजार करते रहते हैं। यह इंतजार धीरे-धीरे अकेलेपन, भावनात्मक दूरी और बदलते पारिवारिक रिश्तों की तस्वीर बन जाता है।
फिल्म बढ़ती उम्र में अपनों के साथ की जरूरत, गांवों से हो रहे पलायन और बेहतर भविष्य की तलाश में परिवारों के बिखरने से पैदा होने वाले दर्द को सामने लाती है। इसकी कहानी उत्तराखंड के उन गांवों और परिवारों की वास्तविकता से जुड़ती है, जहां रोजगार और शिक्षा के अवसरों की तलाश में युवा घर छोड़कर दूर चले जाते हैं।
ऐसे में ‘पायर’ के विशेष प्रदर्शन केवल एक फिल्म की स्क्रीनिंग नहीं, बल्कि पहाड़ के समाज और उसकी बदलती जीवनशैली से जुड़े सवालों को महसूस करने का अवसर भी होंगे। स्थानीय दर्शकों के लिए इसकी कहानी इसलिए भी खास होगी, क्योंकि इसमें दिखाई गई परिस्थितियां उनके अपने परिवेश और अनुभवों से मेल खाती हैं।
सिनेमा को दर्शकों के करीब लाने की पहल
पिक्चरटाइम का मोबाइल थिएटर मॉडल पोर्टेबल व्यवस्था के माध्यम से प्रोजेक्शन और साउंड जैसी सुविधाओं से युक्त सिनेमाई अनुभव उपलब्ध कराता है। इसकी मदद से उन क्षेत्रों में भी फिल्मों का प्रदर्शन संभव हो पाता है, जहां स्थायी सिनेमाघरों की सुविधा नहीं है।
फिल्मों को महानगरों और मल्टीप्लेक्स तक सीमित रखने के बजाय छोटे शहरों के दर्शकों तक पहुंचाने का यह प्रयास वितरण व्यवस्था के वैकल्पिक रास्तों को भी सामने लाता है। इससे स्थानीय दर्शकों को बड़े पर्दे पर फिल्म देखने का अवसर मिलने के साथ ही क्षेत्रीय जीवन और संस्कृति से जुड़ी कहानियों को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
विनोद कापड़ी की फिल्म ‘पायर (चिता)’ 30 अक्टूबर को हिंदी और मलयालम भाषाओं में सिनेमाघरों में रिलीज होगी। इससे पहले उत्तराखंड के बेरीनाग, बागेश्वर और श्रीनगर गढ़वाल में होने वाले विशेष प्रदर्शन फिल्म को उसके अपने सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश के दर्शकों तक पहुंचाने की महत्वपूर्ण पहल हैं।



