Uttarakhand

कहीं हम बच्चों को डिजिटल बाल श्रमिक तो नहीं बना रहे

डिजिटल अर्थव्यवस्था बच्चों को शिक्षा, नवाचार, उद्यमिता और नए वैश्विक अवसरों से जोड़ सकती है, परंतु इस लालच में यदि हमने उनकी डिजिटल सुरक्षा, गोपनीयता और मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा की तो यह गंभीर चुनौती भी बन सकती है। वर्तमान में इसके संकेत सामने आने भी लगे हैं। आज जब डिजिटल क्रांति की रफ्तार तेज है, ऐसे में संपूर्ण विश्व में यह बहस तेज हो रही है कि हम कहीं बच्चों को डिजिटल बाल श्रमिक तो नहीं बना रहे हैं। इस डिजिटल युग में कारखानों की जगह स्मार्ट फोन और मशीनों की जगह एल्गोरिदम ने ले ली है। इंटरनेट मीडिया की दुनिया में आज बच्चों का बचपन लाइक्स और व्यूज के बीच पलने को मजबूर है। बच्चे के मोबाइल स्क्रालिंग, चैटिंग, रील्स देखने के साथ-साथ रील्स बनाने में मां-बाप की सक्रिय सहभागिता चिंता का विषय बन रही है। इसके कारण 80 प्रतिशत से भी अधिक बच्चों के चित्र अथवा उनके वीडियो इंटरनेट पर विद्यमान हैं। इसका अर्थ है कि खेलने, खाने, पढ़ने और कुछ रचनात्मक कार्य करने की उम्र में हम स्वयं ही उन्हें साइबर बुलिंग, आनलाइन शोषण, डिजिटल लत के साथ-साथ निजता के हनन और अनचाहे मानसिक दबाव की ओर धकेल रहे हैं। दुनिया में आज करीब 40 करोड़ बच्चे इंटरनेट का प्रयोग करते हैं। भारत में नौ से तेरह साल के लगभग 76 प्रतिशत बच्चे फेसबुक, इंस्टाग्राम एवं यू-ट्यूब जैसे इंटरनेट मीडिया का प्रयोग केवल समय बिताने के लिए ही नहीं कर रहे, बल्कि वे किड्स इन्फ्लुएंसर बनने की ओर भी अग्रसर हैं। आज अकेले इंस्टाग्राम पर 83 हजार से भी अधिक किड्स इन्फ्लुएंसर सक्रिय हैं। हाल के वर्षों में इनकी संख्या में 41 प्रतिशत से भी अधिक की वृद्धि हुई है। इंटरनेट मीडिया से संलग्न बच्चे अब केवल रील्स अथवा वीडियो देखने वाले ही नहीं रह गए हैं, बल्कि कंटेंट क्रिएटर और प्रमोशन के लिए ब्रांड भी बन रहे हैं। कंटेंट क्रिएशन से ये लाखों रुपये भी अर्जित कर रहे हैं। सर्वेक्षण बताते हैं कि 2010 के बाद पैदा हुए 37 प्रतिशत बच्चे इंटरनेट मीडिया के क्षेत्र में इन्फ्लुएंसर बनना चाहते हैं। इन बच्चों के एकाउंट, उनकी वीडियो शूटिंग, उसका संपादन तथा इंटरनेट मीडिया पर अपलोड करने के कार्य इन बच्चों के मां-बाप संभालते हैं। यह किड्स डिजिटल इकोनमी केवल एक आर्थिक अवधारणा ही नहीं है, यह बाल अधिकारों, सुरक्षा, गोपनीयता और नैतिकता से जुड़ा मुद्दा भी है। जब बच्चे इंटरनेट मीडिया पर सक्रिय होते हैं, वीडियो देखते या गेम खेलते हैं, तो वे केवल मनोरंजन ही नहीं, डाटा भी उत्पन्न कर रहे होते हैं। उनके व्यवहार, आदतें, पसंद-नापसंद, रुचियां इन डिजिटल कंपनियों के लिए एक आर्थिक वैल्यू लिए होती हैं। यानी जब कोई बच्चा विडियो देखता है, कोई एप डाउनलोड करता है, गेम खेलता है अथवा आनलाइन कक्षा में भाग लेता है, तो ऐसे समय में उसकी लोकेशन, व्यवहार और उसकी रुचियों से जुड़े डाटा एकत्र किए जाते हैं। डिजिटल कंपनियां इस डाटा का उपयोग मार्केट रिसर्च, विज्ञापनों, व्यावसायिक रणनीतियों के निर्माण तथा एल्गोरिदमिक सिफारिशों के लिए करती हैं। यही वजह है कि बच्चों से जुड़े डाटा की सुरक्षा आज गंभीर चिंता का विषय बन रही है।

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