विशेषज्ञों की चेतावनी और भविष्य की दिशा

-डॉ ज्योति प्रसाद गैरोला- भारत आज विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है। बढ़ती आबादी को लेकर दशकों से अर्थशास्त्री, जनसंख्या वैज्ञानिक, पर्यावरणविद् और समाजशास्त्री अपनी-अपनी दृष्टि प्रस्तुत करते रहे हैं। अधिकांश विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि समस्या केवल जनसंख्या की संख्या नहीं, बल्कि उसके अनुरूप शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और संसाधनों की उपलब्धता है। यदि इन क्षेत्रों में पर्याप्त निवेश न हो तो जनसंख्या विकास में बाधा बन सकती है, जबकि उचित नीतियों के साथ यही सबसे बड़ी शक्ति भी सिद्ध हो सकती है।
1. थॉमस रॉबर्ट माल्थस (Thomas Robert Malthus) पुस्तक: An Essay on the Principle of Population (1798) माल्थस ने कहा कि यदि जनसंख्या की वृद्धि पर नियंत्रण न रखा जाए तो खाद्यान्न और प्राकृतिक संसाधन पीछे रह जाएंगे, जिससे भूख, गरीबी और संकट उत्पन्न होंगे। उनके सिद्धांत ने विश्वभर में जनसंख्या नीति पर गहरा प्रभाव डाला।
2. पॉल आर. एर्लिख(Paul R. Ehrlich) पुस्तक: The Population Bomb (1968) एर्लिख ने चेतावनी दी कि अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि से भोजन, पानी और पर्यावरण पर गंभीर संकट आएगा। उनकी पुस्तक ने विश्वव्यापी बहस छेड़ी, हालांकि उनकी कई भविष्यवाणियाँ बाद में सही सिद्ध नहीं हुईं और अनेक विद्वानों ने उनकी आलोचना भी की।
3. अमर्त्य सेन (Amartya Sen) पुस्तक: Poverty and Famines तथा जाँ द्रेज़ के साथ India: Development and Participation अमर्त्य सेन का मत है कि केवल जनसंख्या को दोष देना उचित नहीं है। उनका तर्क है कि अकाल और गरीबी का मुख्य कारण संसाधनों का असमान वितरण, शिक्षा और स्वास्थ्य की कमी तथा सामाजिक अवसरों का अभाव है।
4. एम. एस. स्वामीनाथन: हरित क्रांति के जनक माने जाने वाले स्वामीनाथन का मानना था कि बढ़ती जनसंख्या के साथ कृषि उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है, लेकिन यह पर्यावरण और जल संसाधनों की रक्षा करते हुए होना चाहिए। विज्ञान और टिकाऊ कृषि ही दीर्घकालिक समाधान हैं।
5. कृष्णमूर्ति श्रीनिवासन (Krishnamurthy Srinivasan): पुस्तक:Population Concerns in India: Shifting Trends, Policies, and Programs (2017)
उन्होंने भारत की जनसंख्या नीति, परिवार नियोजन कार्यक्रमों और बदलती जनसंख्या प्रवृत्तियों का विस्तृत विश्लेषण किया। उनका निष्कर्ष है कि भारत को कठोर नियंत्रण की बजाय शिक्षा, स्वास्थ्य और महिलाओं के सशक्तिकरण पर आधारित नीति अपनानी चाहिए।
आज अधिकांश जनसंख्या विशेषज्ञों का मत है कि भारत की प्रजनन दर में पिछले दशकों में उल्लेखनीय गिरावट आई है और कई राज्यों में यह प्रतिस्थापन स्तर के आसपास या उससे नीचे पहुँच चुकी है। इसलिए भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती केवल जनसंख्या वृद्धि नहीं, बल्कि युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और कौशल उपलब्ध कराना है।
भारत के लिए सबसे बड़ा संदेश स्पष्ट है—जनसंख्या को बोझ नहीं, बल्कि मानव संसाधन के रूप में विकसित करना होगा। यदि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पर्यावरण संरक्षण पर समान रूप से ध्यान दिया जाए, तो यही विशाल जनसंख्या भारत को विश्व की अग्रणी आर्थिक शक्ति बना सकती है; अन्यथा संसाधनों पर बढ़ता दबाव विकास की गति को प्रभावित करेगा।लेखक,




