Uttarakhand

फ्यूंलानारायण मंदिरः यहां केवल महिलाएं करती हैं भगवान नारायण का पुष्प श्रृंगार

देहरादून। उत्तराखंड में अनेक मंदिर हैं, जिनकी अलग-अलग मान्यताएं उन्हें एक-दूसरे से अलग बनाती हैं। देवभूमि में कुछ मंदिर ऐसे भी हैं, जहां महिलाओं का गर्भगृह में प्रवेश वर्जित होता है लेकिन इसके इतर चमोली जिले में एक ऐसा मंदिर भी है जहां सिर्फ महिलाओं को ही भगवान के गर्भ गृह में श्रृंगार (साज सज्जा) का अधिकार है। चमोली जिले के जोशीमठ विकासखंड की उर्गम घाटी में भर्की गांव है, जहां घने जंगलों के बीच भगवान विष्णु का मंदिर स्थित है, जिसे ‘फ्यूलानारायण’ मंदिर कहते हैं। यह हिमालय क्षेत्र में एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां के कपाट मात्र डेढ़ माह के लिए खुलते हैं। साथ ही मंदिर में महिलाओं द्वारा भगवान नारायण का फूलों से श्रृंगार किया जाता है। साथ ही मंदिर में पूजा का जिम्मा क्षत्रिय जाति के लोगों को होता है।
चमोली जिले की उर्गम घाटी में लगभग 10,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित फ्यूंलानारायण मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। इस मंदिर की सबसे अनूठी परंपरा यह है कि इसमें गर्भगृह के भीतर भगवान नारायण का पुष्प श्रृंगार करने का अधिकार केवल महिलाओं (विशेषकर बालिकाओं या वृद्ध महिलाओं) को ही प्राप्त है।
मान्यता है कि स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी उर्गम घाटी में पुष्प लेने पहुंची तो उन्हें यहां विष्णु भगवान विचरण करते (घूमते) दिखाई दिए। अप्सरा ने भगवान विष्णु को यहां फूलों से बनी माला भेंट की थी। साथ ही अप्सरा भगवान का विभिन्न रंग बिरंगे फूलों से श्रृंगार किया था, तब से यहां महिलाओं की ओर से भगवान के श्रृंगार की परंपरा है। घाटी में दुर्वाशा ऋषि ने भी कई सालों तक तपस्या की थी।
ग्रामीणों का कहना है कि मंदिर में नारायण की मूर्ति चतुर्भुज रुप में विराजमान है। नारायण की मूर्ति के दोनों तरफ जय और विजय दो द्वारपाल हैं, जिन्हें स्थानीय लोगों द्वारा नारायण के बच्चे भी कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मान्यता है कि नारायण के द्वारपाल जय विजय थे। नारद मुनि को एक बार प्रणाम न करने के कारण दोनों को राक्षस कुल में जन्म लेने का श्राप दे दिया था, जिनका दूसरा जन्म रावण व कुम्भकरण के रुप में हुआ। श्री फ्यूलानारायण मन्दिर में नारायण मां नन्दा स्वनूल, जाख क्षेत्रपाल, वन देवियों, पितरों की पूजा की जाती है और अखण्ड धूनि अग्नि कपाट बन्द होने तक जलती रहती है। प्रत्येक दिन पूजा के अलावा बाड़ी व सत्तू का भोग लगाया जाता है। यहां नारायण की पुष्प वाटिका में अनेक प्रकार के रंग बिरंगे फूल खिलते हैं।  नारायण का श्रृंगार करने वाली स्त्री या बालिका को स्थानीय फ्यूयाण कहते हैं। क्योंकि महिलाएं मासिक धर्म के चक्र से बंधी होती हैं, जिस वजह से मंदिर में 10 साल से कम उम्र की बालिका या 55 वर्ष से ज्यादा उम्र की महिलाएं ही नारायण का श्रृंगार करती हैं। जिसके लिए वे बगिया से फूल नारायण के श्रृंगार के लिए लाती हैं।
————————————

Loading

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button