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उत्तराखंड में एक बार फिर बिजली निगमों के कर्मचारी और सरकार की टकराव, छह अक्टूबर से हड़ताल

देहरादून, उत्तराखंड में एक बार फिर बिजली निगमों के कर्मचारी और सरकार टकराव की मुद्रा में हैं। प्रदेश में ऊर्जा निगम, उत्तराखंड जल विद्युत निगम और उत्तराखंड पारेषण निगम से जुड़े अधिकारी और कर्मचारी उत्तराखंड विद्युत-अधिकारी कर्मचारी संयुक्त संघर्ष मोर्चा के बैनर तले आगामी छह अक्टूबर से हड़ताल पर अडिग हैं।

कर्मचारी पुरानी पेंशन, पुरानी एसीपी व्यवस्था और संविदा कार्मिकों के नियमितीकरण समेत 14 सूत्री मांग पत्र सरकार के सामने रख चुके हैं। इधर, उत्तराखंड जल विद्युत निगम प्रशासन ने 189 कार्मिकों को नोटिस जारी कर अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी है। सरकार ने हड़ताल पर रोक लगाने के लिए आवश्यक सेवा अनुरक्षण कानून (एस्मा) लागू कर दिया है।

हड़ताल से निपटने के लिए उत्तर प्रदेश और हरियाणा सहित इन राज्यों से संपर्क

हड़ताल से निपटने की तैयारी में उत्तर प्रदेश और हरियाणा समेत अन्य राज्यों से संपर्क कर मदद मांगी गई है, लेकिन इन राज्यों के कर्मचारी संगठनों ने साफ कर दिया कि कोई भी कर्मचारी उत्तराखंड नहीं जाएगा। फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने पाले में खड़े हैं और दांव-पेच जारी हैं। पिछले दिनों भी बिजली कर्मचारियों ने हड़ताल की चेतावनी दी थी। तब सरकार ने उन्हें मांगों पर विचार का आश्वासन दिया था।

आंदोलित कर्मचारियों बोले- सरकार नहीं उठा रही कोई कदम

आंदोलित कर्मचारियों का कहना है कि सरकार इस दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ी है। उत्तर प्रदेश से अलग हुए उत्तराखंड को बीस वर्ष से अधिक का समय हो गया, लेकिन हड़ताल अथवा आंदोलन प्रत्येक सरकार के लिए चुनौती ही बने रहे। एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड उन प्रदेशों में है, जहां सर्वाधिक हड़ताल होती हैं। आर्थिक संकट से जूझ रहे राज्य को आखिर ये हड़ताल कहां ले जाएंगी। कम से कम सरकार और कर्मचारी संगठन दोनों को इस पर विचार करना चाहिए। बिजली मूलभूत सुविधाओं में शामिल है। आम जन के साथ ही उद्योगों की रफ्तार भी बिजली पर ही निर्भर है। ऐसे में यदि एक दिन भी कर्मचारी हड़ताल पर रहते हैं तो राज्य को कितनी बड़ी आर्थिक हानि होगी, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

सरकार और बिजली निगमों से जुड़े कर्मचारी आमने-सामने

बात सिर्फ कर्मचारियों की ही नहीं है, शिक्षक या छात्र हों अथवा कोई अन्य वर्ग, उन्हें यह समझने की जरूरत है कि आंदोलन से होने वाला नुकसान हमारा अपना ही है। इसकी भरपाई आसान नहीं होती। फिर सवाल यह भी है कि सरकार भी आंदोलन की नौबत क्यों आने देती है। आखिर सरकार और कर्मचारी मिल बैठकर समस्या का समाधान क्यों नहीं तलाशते। हमें नहीं भूलना चाहिए कि अधिकार के लिए सजगता जरूरी हैं, लेकिन कर्तव्य को बिसारना भी ठीक नहीं है। सरकार और बिजली निगमों से जुड़े कर्मचारी आमने-सामने हैं। सरकार एस्मा लागू कर चुकी है, लेकिन कर्मचारी भी आंदोलन पर अडिग हैं। यह राज्य हित में नहीं है

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