पर्वतीय जलधाराएं उत्तराखंड की सबसे बड़ी प्राकृतिक संपदा, इनके सदुपयोग से संवर सकता है प्रदेश का भविष्य

–हेमचंद्र सकलानी–
देहरादून। उत्तराखंड में जब भी किसी जल विद्युत परियोजना अथवा बांध के निर्माण की बात होती है, उसका विरोध शुरू हो जाता है। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर अनेक परियोजनाएं सवालों के घेरे में आ जाती हैं। लेकिन जब हम बिजली की आवश्यकता, विकास और आधुनिक जीवन की अनिवार्यताओं पर विचार करते हैं तो यह प्रश्न भी उठना चाहिए कि आखिर जल विद्युत परियोजनाओं का विरोध कब तक और क्यों? सच कहूं तो मुझे जल विद्युत परियोजनाओं पर गर्व होता है। इसका कारण केवल इन परियोजनाओं का महत्व नहीं, बल्कि इनके साथ मेरा लगभग चार दशक का कार्यानुभव भी जुड़ा हुआ है।
मुझे उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद के हरदुआगंज ताप विद्युत गृह तथा उत्तराखंड जल विद्युत निगम में वर्ष 1969 से 2009 तक लगभग 40 वर्षों तक कार्य करने का अवसर मिला। इस दौरान मैंने बिजली उत्पादन की विभिन्न व्यवस्थाओं, उनकी चुनौतियों और उपयोगिता को नजदीक से समझा है।
मेरा मानना है कि जिस प्रकार देश की सीमाओं की रक्षा करना सैनिकों का दायित्व है, उसी प्रकार अपने कार्यों, कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का समयबद्ध एवं ईमानदारी से निर्वहन करना कर्मचारियों और अधिकारियों की भी देश के प्रति निष्ठा का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
प्रकृति ने उत्तराखंड को दिया है जलधाराओं का वरदान
ईश्वर ने उत्तराखंड सहित पूरे हिमालयी क्षेत्र को प्राकृतिक जलधाराओं का अनमोल वरदान दिया है। नदियों और जलधाराओं का उद्गम पर्वतों से ही होता है। पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक बनावट जल विद्युत उत्पादन के लिए अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध कराती है। ऊंचाई से नीचे की ओर बहते पानी की प्राकृतिक गति और ढाल का उपयोग बांध, जलाशय, सुरंग तथा टरबाइन के माध्यम से बिजली पैदा करने में किया जाता है। इस प्रकार प्रकृति से प्राप्त जलशक्ति को ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है।
वर्ष 1878 में विद्युत बल्ब के विकास के बाद से दुनिया में बिजली के क्षेत्र में लगातार नए प्रयोग और आविष्कार होते रहे हैं। विद्युत उत्पादन की तकनीक विकसित हुई और देखते ही देखते बिजली आधुनिक सभ्यता की सबसे बड़ी जरूरतों में शामिल हो गई। भारत में भी जल विद्युत उत्पादन का इतिहास काफी पुराना है। वर्ष 1897 में दार्जिलिंग क्षेत्र में देश की शुरुआती जल विद्युत परियोजनाओं में से एक स्थापित की गई थी।
ग्लोगी परियोजना ने मसूरी को रोशन कर रचा इतिहास
उत्तराखंड में जल विद्युत उत्पादन का इतिहास गौरवशाली रहा है। मसूरी के निकट भट्टा फॉल के आसपास वर्ष 1907 में अंग्रेजों ने ग्लोगी जल विद्युत परियोजना की नींव रखी। वर्ष 1909 में इस परियोजना से लगभग 3.5 मेगावाट बिजली का उत्पादन शुरू हुआ। उस समय मसूरी बिजली की रोशनी से जगमगाने लगा था। यह अपने आप में ऐतिहासिक उपलब्धि थी।
मेरे लिए यह अत्यंत गर्व और सौभाग्य की बात है कि वर्ष 2009 में ग्लोगी जल विद्युत परियोजना के शताब्दी समारोह के संचालन का अवसर मुझे मिला। इस समारोह की मुख्य अतिथि तत्कालीन विद्युत मंत्री अमृता रावत थीं, जबकि सतपाल महाराज विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उत्तराखंड जल विद्युत निगम के अनुभवी इंजीनियरों ने भी इस आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
ग्लोगी परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक सदी से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह जल विद्युत गृह बिजली उत्पादन की गौरवशाली विरासत को आगे बढ़ा रहा है। यह इस बात का प्रमाण है कि सुविचारित तकनीक, उचित रखरखाव और कुशल संचालन से जल विद्युत परियोजनाएं लंबे समय तक उपयोगी बनी रह सकती हैं।
डाकपत्थर से छिबरो तक विकास की कहानी
वर्ष 1949 में जब डाकपत्थर क्षेत्र में दूर-दूर तक जंगल, झाड़ियां, चाय के बागान और कुछ छिटपुट मकान ही दिखाई देते थे, उस समय देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने डाकपत्थर बांध की आधारशिला रखी थी। उस दौर में शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र जल विद्युत उत्पादन और विकास का महत्वपूर्ण केंद्र बन जाएगा।
डाकपत्थर बैराज से जुड़ी नहर प्रणाली के माध्यम से ढकरानी, ढालीपुर, कुल्हाल और बादशाही बाग जैसी जल विद्युत परियोजनाओं को विकसित किया गया। इन परियोजनाओं ने बिजली उत्पादन के साथ-साथ पूरे क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
डाकपत्थर से लगभग दस किलोमीटर दूर छिबरो में भूमिगत जल विद्युत गृह की स्थापना भी इस क्षेत्र की बड़ी उपलब्धियों में शामिल है। वर्ष 1974 में शुरू हुए इस कार्य से वर्ष 1976 में बिजली उत्पादन प्रारंभ हुआ। लगभग 50 वर्ष बाद भी यह परियोजना अपनी 240 मेगावाट उत्पादन क्षमता के साथ विद्युत व्यवस्था में योगदान दे रही है।
ये परियोजनाएं केवल बिजली उत्पादन के केंद्र नहीं हैं, बल्कि इस बात के उदाहरण भी हैं कि प्राकृतिक संसाधनों का योजनाबद्ध उपयोग किसी क्षेत्र के विकास की दिशा बदल सकता है।
जल विद्युत परियोजनाएं बनाम अन्य ऊर्जा स्रोत
आज बिजली उत्पादन के लिए मुख्य रूप से ताप विद्युत, जल विद्युत, सौर ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा जैसे स्रोतों का उपयोग किया जाता है। प्रत्येक ऊर्जा स्रोत की अपनी उपयोगिता और सीमाएं हैं। लेकिन जल विद्युत की अपनी विशिष्ट विशेषताएं हैं।
ताप विद्युत गृहों में बिजली उत्पादन के लिए बड़े पैमाने पर कोयले की आवश्यकता होती है। इसके परिवहन पर भी भारी खर्च आता है। कोयले के जलने से धुआं, राख और अन्य प्रदूषक निकलते हैं, जो पर्यावरण को प्रभावित करते हैं। इसके विपरीत जल विद्युत परियोजनाओं में निर्माण के दौरान बांध, सुरंग, जलमार्ग और टरबाइन जैसी व्यवस्थाएं स्थापित करनी पड़ती हैं। एक बार निर्माण पूरा होने और उचित रखरखाव के बाद ये परियोजनाएं कई दशकों तक बिजली उत्पादन कर सकती हैं।
जल विद्युत गृहों की एक अन्य विशेषता यह है कि इनकी उत्पादन क्षमता को आवश्यकता के अनुसार अपेक्षाकृत तेजी से संचालित किया जा सकता है। कई जल विद्युत इकाइयां कम समय में उत्पादन शुरू कर सकती हैं, जबकि ताप विद्युत गृहों को चालू करने और उनकी उत्पादन क्षमता बढ़ाने में अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है।
सौर ऊर्जा भी भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए पर्याप्त भूमि और अनुकूल धूप की आवश्यकता होती है। वहीं जल विद्युत परियोजनाएं सीमित भूभाग में भी स्थापित की जा सकती हैं, हालांकि इनके लिए उपयुक्त जल प्रवाह, भौगोलिक परिस्थितियां और पर्यावरणीय आकलन अनिवार्य हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि किसी एक ऊर्जा स्रोत को दूसरे का विकल्प मान लिया जाए। देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सभी स्रोतों का संतुलित उपयोग जरूरी है। लेकिन उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में जल विद्युत की संभावनाओं की अनदेखी नहीं की जा सकती।
बांधों का विरोध और बिजली की बढ़ती जरूरत
दुनिया में हजारों बड़े बांध निर्मित हैं। इनका उपयोग बिजली उत्पादन, सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और बाढ़ नियंत्रण जैसे उद्देश्यों के लिए किया जाता है। चीन सहित अनेक देशों ने बांधों और जल विद्युत परियोजनाओं के माध्यम से अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है।
भारत में भी बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। घरों में रोशनी से लेकर उद्योगों, अस्पतालों, रेलवे, संचार व्यवस्था और आधुनिक तकनीक तक हर क्षेत्र बिजली पर निर्भर है। ऐसे में यह विरोधाभास समझ से परे लगता है कि एक ओर हम निर्बाध बिजली चाहते हैं और दूसरी ओर बिजली उत्पादन के महत्वपूर्ण स्रोतों का विरोध भी करते हैं।
निश्चित रूप से पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोगों के हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती। किसी भी परियोजना का निर्माण करने से पहले उसके पर्यावरणीय, सामाजिक और भौगोलिक प्रभावों का गंभीरता से अध्ययन होना चाहिए। नदियों के प्राकृतिक प्रवाह, वन संपदा, जैव विविधता और स्थानीय पारिस्थितिकी की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। लेकिन विरोध के बजाय वैज्ञानिक अध्ययन, उचित योजना और संतुलित विकास का रास्ता अपनाया जाना चाहिए।
उत्तराखंड में जल विद्युत उत्पादन की अपार संभावनाएं
उत्तराखंड को जल विद्युत उत्पादन की दृष्टि से देश के महत्वपूर्ण राज्यों में गिना जाता है। यहां की नदियां, जलधाराएं और पर्वतीय ढाल बिजली उत्पादन की अपार संभावनाएं उपलब्ध कराते हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, राज्य में 33 जल विद्युत परियोजनाओं से लगभग 4,249 मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है। इसके अतिरिक्त 25 परियोजनाएं लगभग 2,378 मेगावाट की क्षमता के साथ निर्माणाधीन बताई गई हैं। वहीं 197 छोटी-बड़ी परियोजनाएं लगभग 21,213 मेगावाट की प्रस्तावित क्षमता रखती हैं।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि जल विद्युत उत्पादन के क्षेत्र में उत्तराखंड के पास भविष्य की बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं। यदि इनका पर्यावरणीय संतुलन और जनहित को ध्यान में रखते हुए योजनाबद्ध तरीके से उपयोग किया जाए तो राज्य ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना सकता है।
बिजली के बिना आधुनिक जीवन की कल्पना असंभव
आज बिजली हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। हम दिन में सूर्य के प्रकाश से अपने आसपास की वस्तुओं को देख पाते हैं और रात में बिजली के बल्ब हमें रोशनी देते हैं। प्रकाश का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि यदि हमारे पास हजार आंखें भी हों, लेकिन चारों ओर रोशनी न हो तो हम कुछ नहीं देख पाएंगे।
आज बिजली के बिना रेलगाड़ियां नहीं चल सकतीं, अस्पतालों में अनेक चिकित्सा उपकरण काम नहीं कर सकते, लिफ्ट और मशीनें नहीं चल सकतीं तथा शहरों की जलापूर्ति व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। बहुमंजिला इमारतों में पानी पहुंचाने वाली मोटरें हों या घरों में रोजमर्रा के काम, सब कुछ बिजली पर निर्भर है।
एक-दो दिन पानी और भोजन की व्यवस्था किसी तरह की जा सकती है, लेकिन बिजली के बिना शहरों की बुनियादी व्यवस्थाओं को लंबे समय तक संचालित करना कठिन है। आधुनिक जीवन की लगभग हर महत्वपूर्ण गतिविधि में बिजली की भूमिका है। इसके बिना सुख-सुविधापूर्ण जीवन की कल्पना करना भी मुश्किल है।
रोशनी से बदलती पहाड़ों की तस्वीर
उत्तराखंड में बिजली के महत्व और उससे आए बदलाव को देखना हो तो नई टिहरी से प्रतापनगर की ओर फैली पहाड़ियों को रात के समय देखना चाहिए। कभी ये पहाड़ियां अंधेरे में डूबी रहती थीं, लेकिन आज दूर-दूर तक फैले गांवों और बस्तियों में बिजली के बल्बों की रोशनी दीपावली जैसा दृश्य प्रस्तुत करती है।
यह रोशनी केवल बिजली की उपलब्धता का प्रतीक नहीं है, बल्कि विकास, सुविधा और लोगों के जीवन में आए बदलाव की भी कहानी कहती है। बिजली ने पर्वतीय क्षेत्रों के जीवन को आसान बनाया है और लोगों को आधुनिक सुविधाओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
विकास के साथ पर्यावरण और जनहित का संतुलन भी जरूरी
मेरा स्पष्ट मानना है कि उत्तराखंड की जल विद्युत क्षमता का उपयोग होना चाहिए, लेकिन यह विकास पर्यावरण और स्थानीय जनता की कीमत पर नहीं होना चाहिए। जिन लोगों की भूमि परियोजनाओं के निर्माण में ली जाती है, उन्हें उचित और समयबद्ध मुआवजा मिलना चाहिए। प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, रोजगार और अन्य बुनियादी सुविधाओं की भी समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।
इसके साथ ही भूस्खलन, भूगर्भीय अस्थिरता, नदी के प्राकृतिक प्रवाह, वन क्षेत्र और स्थानीय पर्यावरण से जुड़े पहलुओं का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है। हिमालय एक संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र है। इसलिए यहां किसी भी निर्माण कार्य में विशेष सावधानी और दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाना होगा।
मेरा उद्देश्य किसी भी परियोजना का आंख मूंदकर समर्थन करना नहीं है, बल्कि अपने अनुभव के आधार पर जल विद्युत की उपयोगिता और उत्तराखंड के लिए इसकी संभावनाओं को सामने रखना है।
मुझे गर्व है कि मुझे अपने जीवन के लगभग 40 वर्ष विद्युत उत्पादन के क्षेत्र में कार्य करने का अवसर मिला। ग्लोगी जैसी ऐतिहासिक परियोजना से लेकर डाकपत्थर और छिबरो जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाओं तक का सफर मैंने नजदीक से देखा है। इन परियोजनाओं ने मुझे यह विश्वास दिलाया है कि उत्तराखंड की जलधाराएं केवल प्राकृतिक सौंदर्य का हिस्सा नहीं, बल्कि राज्य की आर्थिक और ऊर्जा समृद्धि का आधार भी बन सकती हैं।
उत्तराखंड के पास प्रकृति का दिया हुआ जल संसाधन है। आवश्यकता इस बात की है कि हम उसका विवेकपूर्ण, वैज्ञानिक और जनहितकारी उपयोग करें। बिजली चाहिए तो ऊर्जा के स्रोत भी विकसित करने होंगे। इसलिए जल विद्युत परियोजनाओं को केवल विरोध की दृष्टि से नहीं, बल्कि विकास, पर्यावरणीय संतुलन और भविष्य की ऊर्जा जरूरतों के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। यही उत्तराखंड के उज्ज्वल भविष्य का रास्ता हो सकता है।




